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Date:19.07.2014 Gyapan Download for Collector & mail

PIP mai salary only 12000/- hui hai Accountant ki & other ki very low increase.

Sabhi NRHM ke management cadre se request hai ki yah gyapan aap Monday 21.07.2014 ko Har district mai Collector sab ko Gyapan deve aur Sabhi Accountant se reqest hai ki Sabhi apni personal e-mail id se CM & MD ki email id se mail kare, 

भारत माता मन्दिर, हरिद्वार

 

भारत को मातृदेवी के रूप में चित्रित करके भारतमाता या भारतम्बा कहा जाता है। भारतमाता को प्राय: केसरिया या नारंगी रंग की साड़ी पहने, हाथ में भगवा ध्‍वज लिये हुए चित्रित किया जाता है तथा साथ में सिंह होता है। भारत में भारतमाता के बहुत से मन्दिर हैं। काशी का भारतमाता मन्दिर  अत्यन्त प्रसिद्ध है जिसका उद्घाटन सन् १९३६ में स्वयं महात्‍मा गांधी ने किया था। हरिद्वार  का भारतमाता मन्दिर भी बहुत प्रसिद्ध है।


देवाधिदेव, आदिदेव, महादेव के त्रिशुल पर स्थित काशी को मन्दिरों का नगर होने का गौरव प्राप्त है। यहां देवी-देवताओं के अनेक मन्दिर हैं। इन मन्दिरों के बीच इस प्राचीन महानगर में एक ऐसा भी अद्वितीय मन्दिर है, जिसमें किसी देवी-देवता की प्रतिमा की जगह राष्ट्र का भौगोलिकीय लघु प्रतिरूप मूर्तिमान रूप में विराजित है। ‘भारतमाता मन्दिर‘ के नाम से चर्चित ‘राष्ट्रदेवता‘ का यह मन्दिर आजादी के योद्धाओं के लिए चर्चित विश्वविद्यालय '' महात्‍मा गांधी  काशी विद्यापीठ '' के परिसर में चित्रकला विभाग के समीप स्थित है।

इस मन्दिर के संस्थापक काशी के चर्चित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं काशी विद्यापीठ के संस्थापक स्व. बाबू शिवप्रसाद गुप्‍त थे। इस मन्दिर की स्थापना के विषय में बाबू शिवप्रसाद गुप्त ने एक विज्ञप्ति उस समय जारी की थी, जिसमें लिखा है, इसका निर्माण कार्य सम्वत्‌ १९७५ तद्नुसार वर्ष (१९१८ ई.) में प्रारंभ हुआ और ५-६ वर्ष में पूरा भी हो गया। यहां स्थापित भारतमाता की मूर्ति का शिलान्यास २ अप्रैल, १९२३ को श्री भगवानदास के करकमलों से हुआ था।"

सतह या भूतल पर सफेद और काले संगमरमर  पत्थरों से बनी सम्पूर्ण भारतवर्ष की भौगोलिक स्थिति को दर्शाती मां भारती की यह मूर्ति, पवित्र भारतभूमि की सम्पूर्ण भौगोलिक स्थितियों को आनुपातिक रूप में प्रकट करती है। पूरब से पश्चिम ३२ फुट २ इंच तथा उत्तर से दक्षिण ३० फुट २ इंच के पटल पर बनी मां भारती की इस प्रतिमूर्ति के रूप के लिए ७६२ चौकोर ग्यारह इंच वर्ग के मकराने के सफेद और काले संगमरमर के घनाकार टुकड़ों को जोड़कर भारत महादेश के इस भूगोलीय आकार को मूर्तिरूप प्रदान किया गया है। मां भारती की इस पटलीय मूर्ति के माध्यम से भारत राष्ट्र को पूर्व से पश्चिम तक २३९३ मील तथा उत्तर से दक्षिण तक २३१६ मील के चौकोर भूखण्ड पर फैला दिखाया गया है। इस मूर्ति पटल में हिमालय सहित जिन ४५० पर्वत चोटियों को दिखाया गया है उनकी ऊंचाई पैमाने के अनुसार १ इंच से २००० फीट की ऊंचाई को दर्शाती है। इस में छोटी-बड़ी आठ सौ नदियों को उनके उद्गम स्थल से लेकर अन्तिम छोर तक दिखाया गया है।

इस मूर्ति पटल पर भारत के लगभग समस्त प्रमुख पर्वत, पहाड़ियों, झीलों, नहरों और प्रान्तों के नामों को अंकित किया गया है। लगभग ४५०० वर्ग फुट क्षेत्र में तीन फीट ऊंचे एक विशाल चबूतरे पर यह मन्दिर बना है। भारत माता के इस मन्दिर के मध्य भाग में स्थापित भारत के विभिन्न भौगोलिक उपादानों के रूप में पर्वत, पठार, नदी और समुद्र के सजीव निर्माण के लिए संगमरमर के पत्थरों को जिस कलात्मक ढंग से तराश कर भारत के भौगोलिक भू-परिवेश का यथार्थ प्रतिरूपांकन किया गया है, वह भारत में पत्थर पर कलाकृति निर्माण कार्य में प्राचीन काल से चली आ रही कला और तकनीकी पक्ष को उजागर करती है। वास्तव में राष्ट्रभाव की अनुप्रेरक मां भारती के इस मन्दिर के निर्माण में कला, शिल्प और तकनीकी ज्ञान का उत्कृष्ट समन्वय हुआ है।


भारत माता जी की आरती :-

आरती भारत माता की
आरती भारत माता की, जगत की भाग्यविधाता की॥धृ॥
मुकुटसम हिमगिरिवर सोहे,
चरण को रत्नाकर धोए,...

देवता कण-कण में छाये
वेद के छंद, ग्यान के कंद, करे आनंद,
सस्यश्यामल ऋषिजननीकी॥1॥ जगत की...........

जगत से यह लगती न्यारी,
बनी है इसकी छवि प्यारी,
कि दुनिया झूम उठे सारी,
देखकर झलक, झुकी है पलक, बढ़ी है ललक,
कृपा बरसे जहाँ दाता की॥2॥ जगत की...........

पले जहाँ रघुकुल भूषण राम,
बजाये बंसी जहाँ घनश्याम,
जहाँ पग-पग पर तीरथ धाम,
अनेको पंथ, सहस्त्रों संत, विविध सद्ग्रंथ
सगुण-साकार जगन्माँकी॥3॥ जगत की...........

गोद गंगा-जमुना लहरे,
भगवा फहर-फहर फहरे,
तिरंगा लहर-लहर लहरे,
लगे हैं घाव बहुत गहरे,
हुए हैं खण्ड, करेंगे अखण्ड, यत्न कर चण्ड
सर्वमंगल-वत्सल माँ की॥4।। जगत की...........

बढ़ाया संतों ने सम्मान,
किया वीरों ने जीवनदान,
हिंदुत्व में निहित है प्राण,
चलेंगे साथ, हाथ में हाथ, उठाकर माथ,
शपथ गीता - गौमाता की॥5॥ जगत की...........



सबसे प्यारी भारत माता, इसका झंडा ऊँचा लहराता।
यह देश सबका राज दुलारा, प्राणों से भी हमको प्यारा।।

बड़ी मुशकिल से मिली आजादी, अग्रेजो से छुटी गुलामी।
इसी मिट्टी में जन्मा हूँ मैं, इसी मिट्टी में रम जाऊँगा।।

मेरे देश में अनेकता में एकता, सब दिशा में प्यार झलकता।
सब धर्मों के लोग यहाँ, बस जाते हैं यहाँ वहाँ।।

सबसे प्यारी भारत माता, इसका झंडा ऊँचा रहे लहराता।।



 तेरे नयनों में भर आये नीर तो, लहू मैं बहा दूं माँ|

न्योच्छार तुझपे जीवन करूँ, क्या जिस्म क्या है जाँ ||

 तू धीर गंभीर हिमाला को, मस्तक पे धारण करे |

तू चंचल गंगा जमुना का, प्रतिक्षण वरण करे ||

विविध भी एक हैं , देख ले चाहे जहां |

 जब उठा के लगा दें, हम मस्तक पे धूल ||

बसंत है चारों तरफ, खिले मुस्कान के फूल |

नफरत भी बन जाती है, प्रेम का समाँ ||

 तेरे बेटों की ओ माँ, बस यही है आरजू |

माटी को महकाने की, करें हर पल जुस्तजू ||

प्रेम की बरसात करें, अगर नफ़रत का उठे धुंआ ||


भारत माता के महान् सपूत :-


 

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